अंध भक्त किसे कहते हैं l Andhbhakt Kise Kahate Hain google sir 2021

Andhbhakt Kise Kahate Hain?

अंधा भक्त का मतलब होता है अंधभक्त किसे कहते हैं की आप किसी इंसान Andhbhakt Kise Kahate Hain ,भगवान या कोई जानवर जिसे आप बहुत हे ज्यादा प्यार करते हो उसका सामन और उसे आप दूर नहीं जा सकते उसे अंध भक्त कहते है l

Andhbhakt Kise Kahate Hain

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अंध भक्त अँधा भक्त होता क्या है?

अंधा भक्त का मतलब होता है की आप किसी इंसान ,भगवान या कोई जानवर जिसे आप बहुत हे ज्यादा प्यार करते हो उसका सामन और उसे आप दूर नहीं जा सकते उसे अंध भक्त कहते है l

वह अपनी पसंदीदा सत्ता पर आँखे बंद करके विश्वास करता है और उसका पूर्ण समर्थन करता है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्या सही है क्या गलत है। इसे ही अंधभक्ति कहते है और इसका पालन करने वाला व्यक्ति अंधभक्त कहलाता है।”अंधभक्त किसे कहते हैं

Andhbhakt Kise Kahate Hain

अंधभक्त किसे कहते हैं  ? इसका जवाब हम जैसे साधारण इंसानों के पास तो हो नहीं सकता । क्योंकि हम सभी अंध भक्तों को नहीं पहचान सकते । परंतु गूगल पर सर्च करने पर की अंधभक्त किसे कहते हैं ? बहुत ही रोचक और हैरान करने वाली जानकारी सामने आती है ।

अंधभक्त किसे कहते हैं ? यह बात गूगल पर सर्च करने पर हमें हैरान करने वाली जानकारी मिली है।  गूगल हमें बताता है कि “अंध भक्तों का निर्माण तीनों आत्माओं से मिलकर होता है इंसान गधा और कुत्ता। इन तीन योनि से मिलकर एक अंधभक्त का जन्म होता है। यह इंसान की  तरह चलते हैं फिरते हैं परंतु इनमें सोचने और समझने की शक्ति एक गधे के समान बिल्कुल कम होती है।”

हालांकि में हाजिर है कुछ नहीं बताया जा सकता कि अंधभक्त किसके प्रति अंधा है ?  वह किस के प्रति निष्ठा कर  रहा है ?  उसकी निष्ठा के बारे में कुछ भी उजागर नहीं किया गया है । अतः किसी खास वस्तु या चीज के बारे में ही अंधभक्त की परिभाषा दी गई है यह कहना बिल्कुल अनुचित होगा। अतः यह एक अपूर्ण जानकारी है क्योंकि जब तक अंधभक्त, किसका अंधभक्त है ? जानकारी नहीं मिलेगी तब तक खबर अपूर्ण ही मानी जायेगी।

अंधा भक्त बनते कैसे है?

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अँधा भक्त आदमी जब किसी के साथ ज्यादा रहने लग जये और उसी के साथ रात दिन गुजरे तो उस को आदत सी हो जाती है तो वो आदमी से लगो अंधभक्त किसे कहते हैं l
हो जाता है तो वो उसे अंधा भक्त कहते है l

ये सिर्फ़ मालिक के दिशा-निर्देश पर चलते हैं वरना एक ही स्थान पर खड़े रहते हैं जब तक इन्हें कोई लताड़े नहीं। अपने मालिक की बुरायी सुनकर ये सूंघ कर वहाँ पहुँच जाते हैं और कुत्ते जितने वफ़ादार होते हैं। मालिक के अलावा कोई भी अपरिचित इनके पास से गुज़रे तो ये उस पर भौंकते हैं तथा अगर वो अकेला हो तो हमला भी कर सकते हैं।

ये जन्म से ही अंधे और बहरे होते हैं इसलिये सिर्फ़ नाक से काम लेते हैं और जहाँ इन्हें मालिक की ख़ुशबू ना आए वहाँ उत्पात मचाते हैं। दो इंद्रियाँ कम होने के कारण इनकी ज़ुबान में बहुत ताक़त होती है।

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इनकी चमड़ी बहुत मोटी होती है इसलिए मालिक कितना भी मार ले इन पर कोई असर नही पड़ता बल्कि ये जितना पिटते हैं उतने ज़्यादा ऊर्जावान होते चले जाते हैं। इन्हें सुख दुःख सर्दी गरमी किसी भी चीज़ का कोई एहसास नही होता lअंधभक्त किसे कहते हैं

अब कुछ जवाब भी समझ आ रहे है! ये सब वे अंधभक्त हैं जिनकी बुद्धि को बाबा लोगों द्वारा कुंठित कर दिया जाता है क्योंकि ये अंत्यत अंधश्रद्धालु होते हैं और इन्हें रटाया जाता है कि गुरु वचन परमेश्वर का वचन है और गुरु का स्थान कोई नहीं ले सकता।

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अक्ल के अंधे ये लोग सोचते नहीं हैं । इन्सान आंखों से अंधा हो तो उसकी बाकी ज्ञान इन्द्रियाँ ज़्यादा काम करने लगती हैं, लेकिन अक्ल के अंधों की कोई भी ज्ञान इंद्री काम नहीं करती।अंधभक्त किसे कहते हैं
अंधभक्त लोग सोचते नहीं हैं। ये अपने बाबा को भगवान समझते हैं| उनके चमत्कारों की सौ-सौ कहानियां सुनाते हैं, लेकिन जब इनके बाबा किसी अपराध में जेल जाते हैं तब वे कोई चमत्कार नहीं दिखाते, तब अंधभक्त बाबा के लिये लड़ते-मरते हैं, लेकिन वे कुछ सोचते नहीं हैं।

अंधभक्त श्रद्धा से सुनते हैं पर सोचते नहीं हैं। बाबा जी को किसी भगवान पर विश्वास नहीं होता। बाबा जी Z सिक्योरिटी में बैठकर कहते हैं कि जीवन-मरण ऊपर वाले के हाथ में है| बाबा जी दौलत के ढेर पर बैठकर बोलते हैं कि मोह-माया छोड़ दो लेकिन अपने डेरों को अय्याशी के महल बनाते हैं व उत्तराधिकारी अपने बेटे को ही बनायेंगे।

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भक्तों को लगता है कि उनके सारे मसले बाबा जी हल करते हैं, लेकिन जब बाबा जी मसलों में फंसते हैं, तब बाबा जी बड़े वकीलों की मदद लेते हैं। अंधभक्त बाबा जी के लिये दुखी होते हैं, भक्त बीमार होते हैं, डॉक्टर से दवा लेते हैं।

जब ठीक हो जाते हैं तो कहते हैं, बाबा जी ने बचा लिया और जब बाबा जी बीमार होते हैं तो बड़े डॉक्टरों से महंगे हस्पतालों में इलाज़ करवाते हैं। अंधभक्त उनके ठीक होने की दुआ करते हैं ।अंधभक्त किसे कहते हैं

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सूक्ष्मता से इनके जीवन पर दृष्टि डालें तो वास्तविक तथ्य पकड़ में आने लगते हैं। वास्तव मंर इन अंधभक्तों की इस भीड़ के मूल में दुःख है, अभाव है, गरीबी है, अविद्या है, अज्ञान है और शारीरिक व मानसिक शोषण हैा

अंधविश्वास एक ऐसा विश्वास है जिस पर आडंबरों की फसल लहराती है। जरा ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि ऐसे भक्तों की संख्या में ज्यादा संख्या महिलाओं, गरीबों, दलितों और शोषितों की है।

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इनमें कोई अपने बेटे से परेशान है तो कोई अपनी बहू से, किसी का जमीन का झगड़ा चल रहा है तो किसी को कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अपनी सारी जायदाद बेचनी पड़ी है। किसी को सन्तान चाहिये तो किसी को नौकरी।

हर आदमी एक तलाश में है। ये भीड़ जिस तलाश में है वो धार्मिक तलाश नहीं है। ये भौतिक लोभ की आकांक्षा में उपजी प्रतिक्रिया है। जिसे स्वयं की तलाश होती है उसे भीड़ की जरूरत नहीं| उसे तो एकांत की जरूरत होती है।

उसे किसी रामपाल, आसाराम, राम रहीम के पास नहीं, किसी आध्यात्मिक गुरु के पास जाना होता है। तब उसे पैसा, पद और प्रतिष्ठा के साथ भौतिक अभीप्साओं की जरूरत नहीं | न ही गंगा न ही ये साधू संत और न ही इनके मेले और झमेले।अंधभक्त किसे कहते हैं

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उसे ज्ञान की जरुरत होती है।
गीता में भगवान कहते हैं –
न ही ज्ञानेन सदृशं पवित्रम
अर्थात ज्ञान के समान पवित्र और कुछ नहीं है।

लेकिन बड़ी बात ! आज ज्ञान की जरूरत किसे है ? चेतना के विकास के लिए कौन योग दर्शन पढ़ना चाहता है? वैदिक दर्शनाचार्यों, शुद्ध वैदिक सिद्धांतों के ज्ञाता विद्वानों के पास महज कुछ ही लोग जाते हैं ।

कितने सिद्ध महात्माओं को तो हम जानते तक नहीं जो चेतना को परिष्कृत करने, ध्यान करने और साधना करने की बातें करते हैं उन के यहां भीड़ कम होती है और जो नौकरी देने, सन्तान सुख देने और अमीर बनाने के सपने दिखाता है उसके यहाँ लोग टूट पड़ते हैँ।

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सत्य साईं बाबा के यहाँ नेताओं और बड़े-बड़े अधिकारियों की लाइन लगी रहती थी, क्योंकि वो हवा से घड़ी, सोने की चैन, सोने का शिवलिंग प्रगट कर देते थे, राख और शहद बांटते थे।अंधभक्त किसे कहते हैं
क्या ही आश्चर्य की बात है कि जिस साईं बाबा ने पूरा जीवन फकीरी में बिता दिया उसकी मूर्तियों के मुकुट पर स्वर्ण और हीरे जड़ें हैं। जिस बुद्ध ने धार्मिक आडम्बरों को बड़ा झटका दिया, संसार में उन्हीं की सबसे ज्यादा मूर्तियां हैं।

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वास्तव में ये सब अन्धविश्वास एक दिन में पैदा नहीं होता, ये पूरा एक चक्र है। जरा ध्यान से टीवी देखिये, रेडियो सुनिये, तो हम क्या देख रहें हैं? क्या सुन रहें हैं? अन्धविश्वास ही तो देख रहें हैं।अंधभक्त किसे कहते हैं

वही तो सुन रहे हैं- कोकाकोला से मन ठंडा होता है, फलां बनियान पहन लो लड़कियां तुम्हारे लिए सब कुछ कर देंगी, ये इत्र लगाओ तो लड़कियां तुम्हारे पर मर जाएंगी, इस कम्पनी की चड्ढी पहन लो तो गुंडे अपने आप भाग जाएंगे, ये पान मसाला खाओ स्वास्थ्य इतना ठीक रहेगा कि दिमाग खुल जाएगा।

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इन सब मूर्खतापूर्ण विज्ञापनों पर रोक लगनी चाहिए तभी हम चाहे कोई आर्थिक बाजार हो या धार्मिक बाजार इससे बच सकतें हैं। ये तथाकथित धार्मिक गुरु (बाबा) परामर्शी होते हैं|

ये ऐसा धार्मिक परामर्श करते हैं, जिससे आदमी का विवेक शून्य हो जाता है और व्यक्ति वही करने लगता है जो उस के अवचेतन में भर दिया जाता है।
आज आवश्यकता है जागरूकता की, विवेक पैदा करने की, तार्किक बनने की और उससे भी ज्यादा आवश्यक है सच्चे गुरु की पहचान जहां तत्व ज्ञान की प्राप्ति होती हो ।अंधभक्त किसे कहते हैं

वरना हम यूँ ही भटकते रहेंगे। ॠषिओं ने कहा है कि –
ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः अर्थात ज्ञान के बिना कोई मुक्ति नहीं है।

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जो लोग कहते हैं कि धर्म का मार्ग कठिन है, वे भूल करते हैं । धर्म का मार्ग अति सरल और स्वाभाविक है । कठिन मार्ग अधर्म का है जिसके लिए षड्यंत्रों, कुटिल निश्चयों, टेढ़ी चालों और छल-छद्म के लिए तैयारियाँ करनी पड़ती हैं और उनको निभाना पड़ता है तथा प्रकट होने का भय दुःखदायक होता है ।

धर्म करने में इन सबकी आवश्यकता नहीं होती, न दुःख, न भय अपितु मन को शान्ति, आत्मा की प्रसन्नता तथा लोगों का प्यार सदा प्राप्त होता है । आजकल के अपराधियों की स्थिति हमारे सामने है । यह इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि अपराधी लोग हमेशा टेंशन में रहते हैं, सदा भयभीत रहते हैं, और कब दंड मिलेगा, इस खतरे से जूझते रहते हैं।

सत्यवादी परोपकारी लोग भले ही गरीब हों, परंतु सदा निर्भय तथा आनंद में रहते हैं । अपने आस पड़ोस में किसी भी ईमानदार व्यक्ति को देख लें, वह इस बात का जीवित उदाहरण है।

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Andhbhakt Kise Kahate Hain
महर्षि दयानंद आधुनिक भारत में एकमात्र ऐसे सत्पुरुष हुए हैं, जिन्होंने न अपना नाम लेने का कोई गुरुमंत्र दिया, न अपनी समाधी बनने दी, न ही अपने नाम से कोई मत-सम्प्रदाय चलाया।अंधभक्त किसे कहते हैं

स्वामी दयानन्द जी ने प्राचीन काल से प्रतिपादित ऋषि-मुनियों द्वारा वर्णित, श्री राम और श्री कृष्ण सरीखे महापुरुषों द्वारा पोषित वैदिक धर्म को पुन: स्थापित किया।
उन्होंने अपना नाम नहीं अपितु ईश्वर के सर्वश्रेष्ठ निज नाम ओ३म् का नाम लेना सिखाया।

उन्होंने अपना मत नहीं अपितु श्रेष्ठ गुण-कर्म और स्वाभाव वाले अर्थात आर्यों को संगठित करने के लिए आर्यसमाज स्थापित किया। स्वामी दयानन्द का उद्देश्य केवल एक ही था “वेदों की ओर लौटो। वेदों के सत्य उपदेश से ही सब का कल्याण होगा।”

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